क्या कहें और किससे कहें ?
बेहतर है कि आप चुप ही रहें !!
सुना कबीर स्कूल नहीं गया
ये मजाक भी हम कैसे सहें ?
कल भी पाठशालाएं नहीं थीं
क्या पढ़ाने वाले भी अब न रहें ?
क्या होगा तब मुल्क में ,
जब गंगा ही अपनी रौ में न बहें ?
बहुत बैचनी सी है दिल में ,
कह दो दिलों को,दिल्ली में ना रहें !!
घाट ही आसरा है बनारस में “पंकज”
अब इसे छोड़ किस जगह को गहें !!