मंगलवार, 12 मार्च 2013

घाट ही आसरा है बनारस में “पंकज”


क्या कहें और किससे कहें ?

बेहतर है कि आप चुप ही रहें !!

सुना कबीर स्कूल नहीं गया

ये मजाक भी हम कैसे सहें ?

कल भी पाठशालाएं नहीं थीं

क्या पढ़ाने वाले भी अब न रहें ?

क्या होगा तब मुल्क में ,

जब गंगा ही अपनी रौ में न बहें ?

बहुत बैचनी सी है दिल में ,

कह दो दिलों को,दिल्ली में ना रहें !!

घाट ही आसरा है बनारस में “पंकज”

अब इसे छोड़ किस जगह को गहें !!