अब हम भी वही किस्सा दुहराने लगे है ।।
खौफ खा कर जी हजुरी लगाने लगे हैं ।।
इनकी तरफदारी न की तो याद रखना ,
इसी घाट पर कितने ठिकाने लगे हैं ।।
कौन कहता सच जीने मरने के लिए है ,
जाननेवाले भी इसे आज छुपाने लगे हैं ।।
उजाला हो गया बहुत इनकी नजर में ,
जलता दिया भी ये लोग बुझाने लगे हैं ।।
खतरनाक ही नहीं वहशी भी हैं ये लोग ,
घाव जहाँ है वही छुरा भी घुसाने लगे हैं ।।
डरा नहीं मैं बस सावधान कर रहा तुमको ,
हर किसी के सामने ऐसे मंज़र आने लगे हैं ।।
और कुछ हो जाये तुमसे जवानी के जोश में ,
आज दोस्त भी दोस्त से हाथ छुड़ाने लगे हैं ।।
बोलना तो गुनाह था पहले भी यहाँ पर यारों
चुप भी रहे तो छाछठ ए की धारा लगाने लगे हैं ।।
कुछ दीवाने लोग भी हैं इस मुल्क में “पंकज”
इसी वक़्त मशाल उठाके जो गीत गाने लगे हैं ।।
©️पंकज
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